क्यों?
मैंने सोचा कि अपनी हिंदी की भी कवितायें कहीं सुरक्षित करूँ।
बात 'क्यों' पर आकर अटक गई.
ऐसा 'क्यों' हुआ? ऐसा 'क्यों' नहीं हुआ? मैं ऐसा 'क्यों' करूँ? 'क्यों' नहीं? अगर ऐसा तो 'क्यों'? अगर नहीं तो 'क्यों' नहीं?
'क्यों' सारे प्रश्नों का सम्राट है। सारे प्रश्नों के उत्तर किसी न किसी तरह से इसी 'क्यों' पर आकर उलझ जाते हैं। यहाँ फिर से एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है कि ऐसा 'क्यों'? इस 'क्यों' कि श्रृंखला कभी समाप्त नहीं होने वाली। एक 'क्यों' विश्राम पर जाता है तो दूसरा आ खड़ा होता है। अंततः यह जिंदगी ही 'क्यों' है। यह प्रश्न नहीं, जिंदगी कि परिभाषा है।
जो भी हो, कुछ भी हो, इतना जरुर है कि हर 'क्यों' का जवाब नहीं होता.
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